Tuesday, September 7, 2010

मुझको ये गम क्या होता है,


अश्कों के समंदर से गुजरा हूँ मैं,
दर्द-ए-अह्सास से भी गुज़र होता है अक्सर्,
फिर भी होंठों से मुस्कुराहट ना जुदा होता है,
कोई बता दे मुझको ये गम क्या होता है,

दिल की हसरतें भी दम तोड़ चुकी हैं,
सपनों की किर्चियां भी चुभी है मुझको,
आंखो से फिर भी एक चमक अयां होता है,
कोई बता दे मुझको ये गम क्या होता है,

बाग मेरा सारा अब सेहरा हुआ,
अब तो रेत में ही खुश्बू मैने ढूंढ लिया है,
कांटो से ही हुस्न-ए-गुल बयां होता है,
कोई बता दे मुझको ये गम क्या होता है,

वफाओं का जनाज़ा भी उठाया है मैने,
हुस्न-ए-इश्क़ को भी मैने कांधा दिया है,
कब्र के फूलों से खुश्बू कब जुदा होता है,
कोई बता दे मुझको ये गम क्या होता है...!!!

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